- मंजुल भारद्वाज
संघ के विकार से दो-दो हाथ करते हुए राहुल ने भारत के मन में बसे राम को संघ के चंगुल से मुक्त करने के लिए 'हिन्दू और हिंदुत्व' के भेद को बखूबी उजागर कर उसे जनता के साथ जोड़ा है। इस पहल को और तेज़ करने की ज़रूरत है। दूसरी पहल राहुल गांधी करने की प्रक्रिया में है जिसका जिक्र उन्होंने हाल ही में गुजरात की एक सभा में किया। वह है 'सहकारिता आधारित जन अर्थव्यवस्था'। ऐतिहासिक है अमूल का सहकारिता मॉडल।
गांधी भारतीय राजनीति की मुक्ति चेतना हैं तो नेहरू भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद। गांधी ने भारत की सोई हुई राजनैतिक चेतना को जगाया तो नेहरू ने वर्णवादी मानस में लोकतंत्र को बसाया। गांधी ने अंतिम व्यक्ति को देश की राजनीति की धुरी बनाया तो नेहरू ने अंतिम व्यक्ति को सत्ता से जोड़ा। गांधी ने सर्वधर्म समभाव को अपने आन्दोलन का हिस्सा बनाया तो नेहरू ने संवैधानिक दायित्वों को निभाते हुए धर्म को व्यक्तिगत दायरे में रखकर विज्ञान को अपनाया। गांधी ने ग्राम स्वराज का सपना देखा तो नेहरू ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को खड़ा किया। विकारी संघ ने गांधी की हत्या की तो लोहियावादियों ने भारत के सबसे बड़े सोशलिस्ट नेहरू के संविधान सम्मत भारत निर्माण पर मट्ठा डालने का काम किया और अंतत विकारी संघ की सत्ता के सारथी बने और भारतीय लोकतंत्र को 'हिन्दू राष्ट्र' के अंधे गह्वर में धकेल दिया।
विकारवादी-वर्णवादी संघ आज देश पर राज कर रहा है। देश की विविधता का ध्वंस करते हुए जनसंहार कर रहा है।
धार्मिक उन्माद में अंधे हो चुके बहुलतावादियों के कत्ले-आम के दौर में कांग्रेस ही नहीं, भारत के हर राजनैतिक दल को मंथन करने की जरूरत है। समाजवादियों को यह मंथन करने की ज़रूरत है कि क्यों उन्होंने गांधी के हत्यारों को सत्ता पर बिठाया? सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन में मरणासन्न संघ को राजनैतिक संजीवनी दी? क्यों वे संघ सरकार के सारथी बने? वामपंथियों को देश को बताना होगा कि क्यों उन्होंने राजनैतिक आत्महत्या की? धर्मनिरपेक्षता पर मनमोहन सिंह को दिया समर्थन क्यों वापस लिया? मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को वामपंथी जानते थे तो अमेरिका के साथ किये 'वन टू थ्री अग्रीमेंट' से धर्मनिरपेक्षता कैसे खतरे में पड़ी? अंधा विरोध बर्बादी की कगार पर ले जाता है। कांग्रेस का अंधा विरोध करने वाले कांग्रेस की तरह अपने अतीत में दफन हो गए हैं और विकारी संघ हिन्दू राष्ट्र का वर्णवादी परचम फहराने के लिए भारत की विविधता को बहुलतावादी तानाशाही में बदल रहा है।
सत्ता सुख भोगने के बाद कांग्रेस सोई पड़ी है। सत्ता सुख, देश की आर्थिक सम्पन्नता और संचार क्रांति के अंधड़ में कांग्रेस ने नेहरू की विरासत को समाप्त कर दिया। कांग्रेस ने मंदिर का ताला खुलवाकर देश को धर्म के हवाले कर दिया। नेहरू ने विकारी संघ के ज़हर को अपनी संवैधानिक दृष्टि और दायित्व से उभरने नहीं दिया। मंदिर का ताला खुलवाकर उसी ज़हर को कांग्रेस ने जन-जन में पनपने दिया। रामजन्मभूमि आन्दोलन का मार्ग कांग्रेस ने दिया। विकारी संघ को पुन: ब्राह्मणवाद का फन उठाने के लिए प्रेरित किया। गैर गांधी कांग्रेसी विद्वान प्रधानमन्त्री ने बाबरी ढांचा गिरने दिया। ख़ुफ़िया विभाग की रिपोर्ट को नज़रंदाज़ करते हुए वे ढांचा गिरने तक समाधिस्थ रहे और देश के संविधान पर कुठाराघात किया। देश आज उसी की सज़ा भुगत रहा है। पीवी नरसिम्हा राव बीजेपी के राम से नहीं लड़ पाए क्योंकि उन्होंने राम को देश का नहीं बीजेपी का बना दिया। उन्हें राम से नहीं, विकारी संघ से लड़ना था। कांग्रेस की यह विध्वंसक भूल थी जो आज देश के सर्वधर्म समभाव के ताने-बाने को जला रही है।
दूसरी बड़ी भूल कांग्रेस ने भूमंडलीकरण की नीति को अपनाकर की। देश में पैसा आया। एक नया मध्यम वर्ग तैयार हुआ। देश की युवा पीढ़ी सिलिकॉन वैली की आइकॉन बनी। देश ने अकूत पैसा देखा और सुख भोग के सभी आधुनिक संसाधनों को भोगा। इसी क्रम में देश विकसित देशों के लिए ग्राहक बन गया। जनता नागरिक से ग्राहक बन गई। 'बेचो और खरीदो' की शासन नीति ने विचार प्रक्रिया को ध्वस्त कर 'लालच' को जन्म दिया और 'लालच' विकास का रूप धरकर देश की सत्ता पर काबिज़ हो गया। निजीकरण से देश की सम्पति पूंजीपतियों के पास चली गई। देश पर अब न तो सरकार का राज है और न ही जनता का। राज कर रहे हैं सिर्फ पूंजीपति।
ग्राहक कभी प्रतिरोध नहीं करते जनता प्रतिरोध करती है। इसलिए नोटबंदी, देशबंदी और 47 लाख देशवासियों की मौत के बावजूद विकास चुनाव जीत रहा है और गंगा अपनी संतानों की लाशों को ढो रही है। प्रतिरोध लोकतंत्र का प्राण है। बिना प्रतिरोध लोकतंत्र सिर्फ भीड़तन्त्र है। आज देश में धर्मान्ध भीड़ का राज है। इस धर्मान्ध भीड़ के राज को खत्म करने के लिए संविधान की पक्षधर सभी राजनैतिक पार्टियों को संविधान सम्मत भारत के लिए आत्ममंथन करना अनिवार्य है ।
राहुल गांधी ने कांग्रेस की विध्वंसक और ऐतिहासिक त्रुटियों को सुधारने की पहल की है। राहुल ने नरसिम्हा राव के 'बीजेपी के राम' को किये गए राजनैतिक समर्पण को परास्त करने का सूत्र निकाल लिया है। संघ के विकार से दो-दो हाथ करते हुए राहुल ने भारत के मन में बसे राम को संघ के चंगुल से मुक्त करने के लिए 'हिन्दू और हिंदुत्व' के भेद को बखूबी उजागर कर उसे जनता के साथ जोड़ा है। इस पहल को और तेज़ करने की ज़रूरत है। दूसरी पहल राहुल गांधी करने की प्रक्रिया में है जिसका जिक्र उन्होंने हाल ही में गुजरात की एक सभा में किया। वह है 'सहकारिता आधारित जन अर्थव्यवस्था'। ऐतिहासिक है अमूल का सहकारिता मॉडल। कांग्रेस की यह अनूठी पहल थी। नेहरू ने 'सहकारिता आधारित जन अर्थव्यवस्था' को देश की अर्थव्यवस्था का आधार बनाया था। 'सहकारिता आधारित जन अर्थव्यवस्था' ही भारत को भूमंडलीकरण के दौर में आई आर्थिक मंदी से बचा पाई थी जिसे मोदी ने नोटबंदी से बर्बाद कर दिया। राहुल को साफ़-साफ़ नेहरू की आर्थिक नीति को अपनाने का ऐलान करने की ज़रूरत है।
जयपुर में हुए कांग्रेस की चिंतन बैठक में एक बहुत बड़ी बात राहुल ने कही जो कांग्रेस के भीतर और बाहर बैठे लोगों को चुभ रही है। वह है भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त करने का ऐलान। राहुल ने ताल ठोंक कर कहा, 'मैंने भारत मां का एक रुपया भी नहीं खाया है।' सत्ता में रहे किसी कांग्रेसी में है यह दम है? उत्तर है, नहीं। 'सत्ता में रहते हुए थोड़ी-थोड़ी कालिख सभी पर लगी हुई है!' मंथन में त्रुटियों को स्वीकारना अनिवार्य होता है और कांग्रेस ने भ्रष्टाचार से देश को मुक्त नहीं किया। देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करना है तो उसकी पहल खुद से करनी होगी और उसी पहल को राहुल ने स्वीकारा। राहुल के पिता राजीव गांधी ने भी प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को सार्वजनिक रूप से स्वीकारा था लेकिन सत्तापिपासु कांग्रसियों ने उन्हें ही भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में फंसा दिया जिसे वे जीते जी भेद नहीं पाए। राहुल को भ्रष्टाचार मुक्त कांग्रेस बनाने के लिए पार्टी के भीतर सफाई अभियान तेज़ करते हुए आर-पार का बिगुल बजाने की शीघ्र शुरुआत करने की जरूरत है। वर्तमान सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त है। अब कमीशन प्रतिशत में नहीं लिया जाता, बल्कि सीधी हिस्सेदारी ली जाती है। क्षेत्रीय पार्टियों के बारे में भी राहुल ने सही कहा है। इसका उदाहरण यूपी और बिहार में देखा जा सकता है। यहां दशकों से क्षेत्रीय पार्टियों का राज है पर पनप कौन रहा है? संघ और बीजेपी!
राहुल ने सिर्फ राजनैतिक पार्टियों को ही नहीं वरन नागरिकों को भी चेताया है। संविधान सम्मत भारत बनाये रखना है तो हिंदुत्व को खारिज करना अनिवार्य है। वक़्त का तकाजा है कि राहुल जनता के साथ अपने संवाद को और तेज़ करें। जल, जंगल और जमीन के संघर्ष में आदिवासियों, बहुजनों को साथ लेते हुए ग्राम स्वराज की ओर चलें!
(लेखक टिप्पणीकार एवं रंगकर्मी हैं)